Sunday, March 14, 2010

द्वारकाधीश अब तू ही रक्षा करना

-शेख रईस अहमद-
जब भी मैं इस बात पर सोचता हूं तो मेरा मस्तिष्क मंडल कुछ और ही सोचने लग जाता है। हमारे देश में कुख्यात अपराधियों या यूं कहे पहुंच वाले लोगों के लिए आज भी प्रशासन उसी तरह गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है जैसा स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले हर हिंदुस्तानी था। सांई भक्ति की आड़ में सैक्स रेकेट चलाने वाले इच्छाधारी बाबा उर्फ शिवमूर्त द्विवेद्वी को दिल्ली पुलिस एक बार फिर से चित्रकूट तो ले गई लेकिन यहां पर कुछ ऐसा हुआ जिससे पुलिस प्रशासन की जांच संदेह के घेरे में आई गई। इच्छाधारी बाबा यूपी के चित्रकूट में जब पुलिस के साथ पहुंचा तो यहां पर लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। यह हुजूम किसी अपराधी को देखने के लिए नहीं बल्कि अपने गुरू के दर्शन के लिए एकत्रित हुई थी। सबसे बड़ी बात यह है कि यहां पर बाबा ने पुलिस के साथ लोगों का मजमा जमाया। पुलिस की मौजूदगी में बड़ी संख्या में लोग आकर बाबा के पैर छूकर आर्शीवाद ले रहे थे। यह सिलसिला यहां ही नहीं रूका, लोगों से मिलने के बाद बबा को पुलिसवालों ने बाहर से चाय मंगाकर पिलाई और खुद पिया। चाय पीते समय बाबा इस तरह से चर्चा में मशगूल थे कि लग ही नहीं रहा था कि पुलिसवालों के साथ कोई अपराधी बैठा है। विडम्बना की बात है कि हमारी पुलिस बस ऐसी महत्वपूर्ण जगहों पर ही चूक क्यों करती हैं। अपराधी चाहे कोई हो उसका न कोई धर्म होता है और न ही कोई ईमान। उसका तो सिर्फ एक ही मकसद होता है जैसे तैसे अपने द्वारा किसी अपराध को अंजाम देना। अब सिक्के के दूसरे पहलू पर भी जरा गौर फरमाए। तथाकथित संतों की बदनामी को देखते हुए अयोध्या के संत महंत मठ मंदिरों में अकेली महिलाओं को न आने की सलाह दे रहे हैं। रामजन्म भूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपालदास का मानना है कि महिलाओं को मंदिरों और मठों में भी अकेले जाने की इजाजत नहीं होनी चाहिए। महंत की सलाह है कि महिलाएं जब भी मंदिरों या मठों में जाए अपने परिवार वालों को साथ लेकर जाए। मेरा कहने का मतलब है कि हम एक तरफ तो अपराधी को वीआईपी ट्रीटमेंट दे रहे हैं और दूसरी तरफ श्रद्धालु महिलाओं पर इस तरह की पाबंदी की बात कह रहे हैं। मंदिर हो मस्जिद या फिर गुरूद्वारा-चर्च। ये सभी ऐसे स्थान है जहां विभिन्न धर्मो के मानने वाले पूजा, इबादत, प्रे या अरदास करते हैं अपने प्रभू से। ऐसे में हमने जरूर वैज्ञानिक तरक्की तो कर ली लेकिन सोच को विकसित नहीं कर पाए। वरना ये होता कि मंदिरों में महिलाओं को अकेली आने जाने की सलाह की बजाए उन पाखंडी ढोंगी साधु महात्माओं को सबक सीखाने की बात कही जाती। इन तथाकथित साधु महात्माओं के लिए भी और कड़े कदम उठाने की जरूरत है।

Friday, March 12, 2010

बाबा ये कैसे पाखंडी बाबा

- शेख रईस अहमद-
आज देश में पाखंडी व ढोंगी बाबाओं का इस कदर जमावड़ा हो गया है कि जिधर देखो उधर पाखंडी बाबाओं के बारे में सुनने को मिल रहा है। कोई बाबा सैक्सी फिल्में बना रहे है तो कोई पूरा सैक्स रेकेट ही चला रहा है। कहीं ये देखने को आ रहा है कि अपनी उम्र से भी आधी उम्र की लड़कियों को ये बाबा अपने प्रेमजाल में फंसा रहे हैं। हमारे घर पर धार्मिक टीवी चैनल नहीं देखे जाते। उसका कारण यह है कि कई बाबा जो टीवी पर नजर आते हैं, न तो ज्ञानी हैं और न ही सम्मान लायक। ज्यादातर तो तृतीय श्रेणी गवैये हैं। कभी राम भजन गा दिया कभी कृष्णा लीला। भक्त लोग फौरन बलिहारी, झूमने लगे। माहौल ही ऐसा बना दिया है। दस-बीस चेला-चेली दौड़ रहे हैं, फूलों से शानदार सजावट कर दी गई है। जनता मदहोश है, उसे लगता है कि हम पुण्य कमा रहे हैं। एक बाबा को प्रवचन देते सुना, कहता है मैंने एक स्वप्न देखा, सपना, ड्रीम, नाइटमेयर। मैं चौका, नाइटमेअर मतलब तो दुस्वप्न होता है। लेकिन पब्लिक की आंखें बंद हैं। बाबा बता रहा है, भक्त आत्मसात कर रहे हैं। राधे-राधे।लेकिन असली कमाई तो सिंहासन पर बैठा बाबा कर रहा है। नए जमाने के बाबा के क्या कहने। बैठने के लिए भव्य सिंहासन चाहिए। घूमने के लिए लंबी गाड़ी और ए-लीग बाबा है तो हेलिकॉप्टर से कम में काम नहीं चलता। आश्रम तो ऐसे बनवा रखे हैं कि मुगल बादशाह भी शर्म के मारे जमीन में गड़ जाएं। एक बापू आसाराम हैं, दिल्ली के बीचोबीच रिज फॉरेस्ट में ही आश्रम है उनका। यह रिज फॉरेस्ट दिल्ली के फेफड़ों का काम करता है। बाबा लोगों ने उसे भी नहीं बख्शा। जंगल में मंगल। ईश्वर की मर्जी? हर तरफ से खबर आ रही है फलां बाबा के लोगों ने यहां जमीन पर कब्जा कर लिया, वहां अवैध रूप से आश्रम बना डाला। बाबा हैं या भूमाफिया?पिछले दिनों प्रतापगढ़ में कृपालु महाराज के आश्रम में भगदड़ मची। आश्रम के लोग कह रहे हैं कि-यह जो इतने लोग मरे इसमें हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं, ईश्वर की मर्जी है। बाबा जी तो ईश्वर के काफी करीब हैं। दिन-रात ईश्वर से साक्षात्कार करते हैं, साक्षात प्रभु के दर्शन करते हैं। तो फिर ईश्वर ने उन्हें क्यों नहीं बताया कि बाबा, कल तुम्हारे आश्रम में भगदड़ मचेगी, लोग मरेंगे? मत करो श्राद्ध, या करो भी तो चुपचाप, अकेले। अपने करीबियों को याद करने के लिए मजमा लगाने की क्या जरूरत? यह कैसा बाबा है जिसे यह नहीं पता कि थोड़ी देर में यहां 64 महिलाएं और बच्चे कुचल कर मरने वाले हैं? ईश्वर के करीब हो तो ईश्वर की मर्जी भी पता होगी! मैं तो कहता हूं कि सबके दाता भगवान द्वारकाधीश हैं तो इन भगवान के दलालों के चक्कर में क्यों पड़ना?बीते जमाने में भी बाबा थे, ज्ञानी थे। फक्कड़ कबीर को दोहे सुनाने के लिए सिंहासन की जरूरत नहीं पड़ी। गुरू नानक ने भव्य आश्रम नहीं बनवाए। माया के मोह में लिपटे आजकल के बाबा, काहे के बाबा? ये बाबा क्या किसी को सच दिखाएंगे? उनकी तो खुद की आंखों पर ऐश-ओ-आराम, सेक्स और ताकत का पर्दा पड़ा है। भोले-भाले भक्तों से कहते हैं, सेक्स से दूर रहो, खुद सेक्स स्कैंडल में पकड़े जाते हैं। और इस बार तो हद ही हो गई। एक बाबा सेक्स रैकेट ही चलाने लगा। मुझे इस बात से तकलीफ नहीं कि बाबा अभी शरीर सुख या आलीशान जीवन के मोह से दूर नहीं हो पाए। यह तो मानव की सहज वृत्ति है। लेकिन भगवा पहनकर तो बेवकूफ बनाने वाली बात ही कही जाएगी।मुझे लगता है कि इन बनतू बाबाओं से ओशो ही अच्छे थे। कुछ ओरिजिनल बात तो करते थे। सेक्स के बारे में खुलकर बात करते थे, पाखंड नहीं। आजकल तो मैंने देखा कि कई बाबाओं ने लहजा भी ओशो जैसा ही अपना लिया है। वैसे ही रुक-रुककर, धीमी आवाज में बोलते हैं। और तो और स को श और श को स भी कहते हैं।लेकिन बाबा को बाबा बनाने में गलती लोगों की अंधभक्ति की भी है। सोचने की बात है कि जो बाबा अपनी ही भलाई में लगा हुआ है वह तुम्हारा भला कैसे कर सकता है? जो बाबा खुद लालच से उबर नहीं पाया वह तुमको क्या सिखा सकता है? जो बाबा आम आदमी और खास आदमी में फर्क करता है, वह क्या भेद मिटाएगा? लेकिन मूढ़मति लोगों को तर्क नहीं समझ आते।यहां एक बात साफ कर दूं कि सारे बाबा चोट्टे हों, ऐसा भी नहीं है। स्वामी रामदेव योग सिखाते हैं, लोगों को इसका फायदा होता है। उनकी दिव्य फार्मेसी में बनने वाले शैंपू, टूथब्रश, टूथपेस्ट और कई दूसरी चीजें बाजार में उपलब्ध दूसरे ब्रैंड्स के मुकाबले काफी सस्ते हैं। श्री श्री रविशंकर सुदर्शन क्रिया सिखाते हैं, मेरे कई परिचित बताते हैं कि उन्हें इससे काफी फायदा हुआ है। इसलिए कहता हूं कि बाजार में बहुत बाबा बिक रहे हैं, खरीदारी में सावधानी की जरूरत है। क्योंकि बाबा तो नेता से भी खतरनाक हैं। नेता नालायक हो तो वोट की ताकत से उसे भगा सकते हो लेकिन बाबा का क्या बिगाड़ोगे?दसवीं में अज्ञेय जी एक कविता पढ़ी थी जो मुझे बहुत पसंद है, थोड़े बदलाव के साथ यहां लिख रहा हूं -बाबा, तुम सूअर तो नहीं हो,नाले में भी नहीं रहते।एक बात पूछूं, उत्तर दोगे?फिर इतना कीचड़ कहां लपेटा,बदबू कहां से लाए? आई होप, किसी सूअर को बाबा से तुलना बुरी न लगे। भले जानवर होते हैं बेचारे। सिंहासन नहीं मांगते, लग्जरी कार, आश्रम नहीं चाहते। गंदगी की सफाई करते हैं। काश कोई वराह अवतार जन्म लेता जो समाज से बाबा के रूप में फैली गंदगी को साफ करता। अब हम लोगों को जरूरत है तो बस इन पाखंडी बाबाओं को सबक सीखाने की।