Sunday, October 11, 2009

सब जुगाड़ का कमाल है

अटल राज में जुगाड़ का चुटकुला बड़ा मशहूर हुआ था। बिल गेट्स ने अपने नुमाइंदे भारत भेजे। कंप्यूटर लेकर नुमाइंदा गांव में जा रहा था। पर रास्ते में गाड़ी दगा दे गई। दूर-दूर तक मैकेनिक नहीं मिला। तो गांव वालों ने थोड़ी कसरत के बाद जुगाड़ से गाड़ी स्टार्ट कर दी। नुमाइंदा कंप्यूटर लेकर गांव पहुंचा। तो कंप्यूटर चला ही नहीं। सो वहां भी गांव के थोड़े पढ़े-लिखे लड़कों ने जुगाड़ से चला दिया। अब जुगाड़ के सहारे इतना कुछ हुआ। तो बात तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंलटन तक पहुंच गई।
सो भौंचक बिल ने वाजपेयी को फोन घुमाया। जुगाड़ टैक्नोलॉजी का राज पूछा। तो वाजपेयी ठहाके लगाकर हंस पड़े। बिल को बताया, यही तो है, जो मेरी सरकार चला रही है। पर यह तो चुटकुला था। अब तो सही मायने में जुगाड़ का जादू दुनिया भर में। तभी तो महज नौ महीने में बराक ओबामा को शांति का नोबल मिल गया। यों जमीन पर ओबामा की पहल का कोई असर तो नहीं दिखा। पर प्राइज कमेटी की दलील सुनिए। ओबामा ने दुनिया भर में बेहतर माहौल बनाया। कूटनीति के क्षेत्र में असाधारण प्रयास किए। परमाणु अप्रसार के लिए पहल की। पर ऐसी जुबानी पहल से नोबल मिलने लगे। तो अपने भारत के बुद्धिजीवियों को हर साल नोबल मिलना चाहिए।
पर दुनिया जुगाड़ से चल रही है। सो जिसकी लाठी, उसकी भैंस। तभी तो अमेरिकी शह पर पाकिस्तान उछल रहा है। आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई का कोई इरादा नहीं दिखता। अमेरिकी मदद तो दिल खोलकर मिल रही। भले उस पैसे का इस्तेमाल भारत के खिलाफ ही क्यों न हो। हाल ही में ओबामा ने अमेरिकी कांग्रेस से भारी-भरकम मदद मंजूर करवा दी। वह भी तब, जब खुद परवेज मुशर्रफ कबूल कर चुके। अमेरिकी मदद का भारत के खिलाफ इस्तेमाल किया था। यानी पाक पर अमेरिकी वरदहस्त। सो अब तक 26/11 के दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई। अमेरिका अपनी बादशाहत कायम रखने को जुगाड़बाजी में लगा हुआ। उधर पड़ोसी चीन नेपाल के रास्ते माओवाद का झंडा गाड़ने के जुगाड़ में। माओवादी पशुपति नाथ से तिरुपति तक रेड कॉरीडोर बना चुके। अब तो महाराष्ट्र और एनसीआर भी नक्सलियों का आरामगाह बन गया। गढ़चिरौली में 18 पुलिस कर्मियों की नक्सलियों ने घेरकर हत्या कर दी। पर कोई मानवाधिकारवादी नहीं बोला। पढ़े-लिखे कोबाड गांधी जैसे माओवादी पकड़े जाएं। तो मानवाधिकार का झंडा फौरन बुलंद हो जाता। पर क्या अपनी सुरक्षा में लगे पुलिस वालों का कोई मानवाधिकार नहीं? क्या कसूर था गढ़चिरौली के उन 18 पुलिस वालों का। सनद रहे, सो याद कराते जाएं। नेपाली माओवादी प्रचंड पीएम बन सितंबर 2008 में भारत दौरे पर आए थे। तो एक इंटरव्यू में उनने जो कहा, उसका लब्बोलुवाब देखिए- "आने वाला वक्त माओवादियों का होगा। एशिया में एक दिन यही झंडा फहराएगा।"
‹‹ जीरो कॉलम ››
इंटरव्यू लेने वाले पत्रकार को हंसी आई। तो प्रचंड ने चेतावनी के अंदाज में कहा, हंसिए मत। आने वाले 10-15 साल में एशिया पर माओवादियों का राज होगा। यही हकीकत है। यानी चीन ने नेपाल को अपनी गिरफ्त में ले लिया। सो नेपाल के रास्ते नक्सलवाद भारत में सिरदर्द बन गया। नक्सलियों को साज-ओ-सामान चीन से मिल रहा। तो भारत में कुछ ऐसे बुद्धिजीवी भी, जो ऐसे लोगों को पनाह दे रहे। विचारधारा के नाम पर पथ से भटके लोग व्यवस्था को चुनौती दे रहे। कोबाड गांधी पकड़े गए। तो एक समर्थक ने क्या कहा, मालूम है? बोले- "वाह री सरकार, कोबाद को पकड़ लिया, क्वात्रोची को छोड़ दिया।" यों भावना सही। पर ड्यूटी निभा रहे सुरक्षा बलों का क्या कसूर?
अब केंद्र सरकार सख्ती दिखा रही। नक्सलियों से निपटने के लिए एयर फोर्स या आर्मी के इस्तेमाल पर विचार कर रही। तो अपने लेफ्टिए खड़े हो गए। ए.बी. वर्धन ने फौरन एतराज जता दिया। पर सरकार पानी सिर से निकलने के बाद ही क्यों जागती? अपनी सुरक्षा बल के जवानों के पास उम्दा हथियार नहीं। तो न ही माओवादियों से लड़ने का तरीका। माओवादी पढ़े-लिखे, सो नई रणनीति तैयार कर लेते। पर अपनी रणनीति कैसी, खुद होम सैक्रेट्री की जुबां से सुनिए। शुक्रवार को एक समारोह में जी.के. पिल्लई ने जुगाड़ पर जोर दिया। हथियारों की खरीद में तीन से पांच साल की लंबी प्रक्रिया का रोना रोया। जब तक अपने जवानों के पास खरीदे गए हथियार पहुंचते। बाजार में उससे उम्दा किस्म पहुंच जाती। सो पिल्लई ने खरीद की नीति बदलने पर जोर दिया। तो साथ में जुगाड़ प्रणाली की भी पैरवी की। उन ने माना, सरकार और सुरक्षा बल भी तकनीकी ज्ञान से अनजान। पर यह कैसी व्यवस्था, जो सुरक्षा भी जुगाड़ के सहारे। जुगाड़ से सरकारें बनती रहतीं। अब महाराष्ट्र में वोट भी नहीं पड़े। पर जुगाड़ तंत्र शुरू हो गया। कांग्रेस ने कहा- क्वराज ठाकरे की मदद नहीं चाहिए।ं पर देखो, कांग्रेस ने यह नहीं कहा, मदद नहीं लेगी। अब जुगाड़ से सरकार बन रही। तो उसका हश्र भी दिख रहा। झारखंड में मधु कोड़ा निर्दलीय एमएलए होकर जुगाड़ से सीएम हो गए। अब कुर्सी नहीं रही। तो घोटाला सामने आया। कोड़ा और उनकी सरकार के दो मंत्रियों पर नकेल कसने लगी। सबने सभा में खूब चांदी काटी। बाकी का जीवन आराम से गुजरे, सो पैसा हांगकांग, थाईलैंड जाकर निवेश कर आए। अब मनी लांडरिंग निरोधक एक्ट के तहत केस दर्ज हो गया। वाकई जुगाड़ है ही कमाल की चीज।

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