दुनिया में रूपयों की भूख इतनी बढ़ गई है जिसकी कोई इंतेहा नहीं है। वेस्टर्न कल्चर के हॉवी होने के साथ साथ हमारे देश में भी रुपए का महत्व बढ़ा है। पहले जहां बचपन में चार आने में ढेर सारी चीजे आ जाती थी वहीं अब पांच रूपयों में भी कुछ नहीं होता है। पुराने जमाने में नाना-नानी और दादा-दादी से सस्ती चीजों की किस्से कहानियां सब लोग सुना करते थे। उस समय घर के बड़े बुजुर्गो द्वारा बताई बाते अब याद आती है। स्मृति के पटल पर आज फिर नाना-नानी और दादा- दादी के चेहरे मेरे मन मस्तिष्क में घुमते नजर आ रहे है। अब तो जमाने के बदलाव के साथ लोग अपने पुराने कमाई के धंधों में वापस हाथ आजमाने में व्यस्त नजर आ रहे है। बहुत कम लोगों को अपने पुराने काम में सफलता भी मिली है। उसकी एक ही वजह है महंगाई के दंश के साथ हर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा का कड़ा मुकाबला। मैं आपको एक ऐसी महिला की आप बीती बता रहा हूं जिसने अपनी जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही सबसे पहले उसको कॉलगर्ल बनना पड़ा। एक समय ऐसा भी आया जब उस कॉलगर्ल को एक घंटे के तीन सौ पाउंड रुपए तक मिलने लगे। लेकिन वही कॉलगर्ल जब एक बड़े देश की महिला वैज्ञानिक के रूप में सबके सामने आई और उसने यह स्वीकार किया कि वो पहले कॉलगर्ल थी और कॉलगर्ल का पेशा संतुष्टि देता था। जी हां मैं बात कर रहा हूं 35 साल की ब्रिटेन की मशहूर महिला वैज्ञानिक बेले डे जूर की। जिसने द टाइम्स अखबार के हवाले से यह स्वीकार किया महिला वैज्ञानिक से अच्छा था वो कॉलगर्ल का पेशा। अब सोचने की बात यह है कि जब किसी देश की महिला वैज्ञानिक सिर्फ और सिर्फ रुपयो-पैसों की खातिर अपने पेशे से परेशान है तो इसे रुपयों की भूख ही कहेंगे। हमारे देश भारत में आज रुपयों-पैसों के दम पर सब कुछ हो रहा है। पैसों के दम पर वो सब कुछ हो रहा है जो केवल केवल हैवानियत के दरिंदे ही किया करते है।
हर जगह रुपयों की भूख?
पुराने जमाने में लोग कहते थे कि भारत गांवों में बसता है। अब जमाने ने बदलाव लिया है। और इस बदलाव में यह सामने आया कि भारत के गांवों से अब ग्रामीण निकलकर शहरों की ओर भाग रहे हैं। सिर्फ सिर्फ और सिर्फ धनवान बनने के लिए। धनवान बनने के लिए आज का युवा जहां फितूरबाज हो गया है, चोरी करने के नए नए बहाने सीख गया है और तो और वो सारे काम सीख गया है जिसे कोई हैवान ही अंजाम दे सकता है। अब तो जरूरत है ऐसे सांस्कृतिक मूल्यो के निर्वहन की जिसे सही तरीके से अमली जामा पहनाने की। युवाओं में जो भटकाव की दिशा आई है उसे अपने मूल्यों को समझने की। नहीं तो वह दिन दूर नहीं होगा जब पूरी दुनिया में रुपया के लिए त्राही त्राही मचेगी।
Tuesday, December 1, 2009
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